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16-05-17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन || HINDI || (OM SHANTI)

“मीठे बच्चे– बाप ही सतगुरू के रूप में तुम बच्चों से गैरन्टी करते हैं, बच्चे मैं तुम्हें अपने साथ वापस ले जाऊंगा, यह गैरन्टी कोई देहधारी कर न सके”

प्रश्नतुम बच्चे यह कथा जो सुन रहे हो, यह पूरी कब होगी?

उत्तरजब तुम फरिश्ते बन जायेंगे। कथा सुनाई जाती है पतित को। जब पावन बन गये तो कथा की दरकार नहीं, इसलिए सूक्ष्मवतन में पार्वती को शंकर ने कथा सुनाई– यह कहना ही रांग है।

प्रश्नशिवबाबा की महिमा में कौन से शब्द राइट हैं, कौन से रांग?

उत्तरशिवबाबा को अभोक्ता, असोचता, करनकरावनहार कहना राइट है। बाकी अकर्ता कहना राइट नहीं क्योंकि वह पतितों को पावन बनाते हैं।

गीतछोड़ भी दे आकाश सिंहासन......   

ओम् शान्ति।

यह है बच्चों की पुकार कि बाबा अभी आ जाओ क्योंकि हम फिर से रावण राज्य में दु:खी हैं। फिर से माया का परछाया पड़ गया है अर्थात् 5 विकार रूपी रावण ने हमको बहुत दु:खी किया है। रेसपाण्ड में बाबा कहते हैं हाँ बच्चे, यह तो मेरा नियम है। यह जरूर आ करके ही कहेंगे ना। हाँ बच्चे, जब-जब धरती पर भारतवासी बिल्कुल ही भ्रष्टाचारी दु:खी बने हैं, कितने गुरू करते हैं सद्गति के लिए, परन्तु वह किसी की सद्गति तो करते नहीं। सभी अन्धों की लाठी तो एक प्रभू ही है। पहले-पहले बाप जन्म देते हैं अर्थात् एडाप्ट करते हैं, गुरू सद्गति करते हैं। अभी न कोई सद्गति करते हैं, न कोई बाबा है। अभी तुम कहते हो परमपिता परमात्मा हमारा बाबा भी है, गुरू भी है। उस एक को ही सतगुरू, सत बाबा कह सकते हैं। वह है सत बाबा, उनको सुप्रीम कहा जाता है। सतगुरू भी है। साथ में ले जाते हैं। गैरन्टी है और कोई गुरू गैरन्टी कभी नहीं करेंगे कि हम तुम आत्माओं को वापिस ले जाऊंगा। वह जानते ही नहीं। यह हैं सब नई बातें। तुम जब इनको देखते हो तो बुद्धि में याद शिव को करना है। वही बाप, टीचर, गुरू है। मनुष्य कोई गुरू करते हैं वा टीचर करते हैं तो उनके शरीर को ही देखते हैं। आत्मा ही भिन्न शरीर धारण कर, भिन्न-भिन्न नाम-रूप, देश, काल में जाती है। अच्छा बाबा तो एक है और एक बार आते हैं। वह तो पुनर्जन्म नहीं लेते। संस्कार तो आत्मा में हैं। वह जब शरीर धारण करेगी तब वर्णन होगा ना। तुम बच्चे बाप की महिमा गाते हो– वह निराकार है, कभी साकार शरीर लेते नहीं हैं। शिव का अपना शरीर तो होता नहीं। परन्तु ज्ञान का सागर, पतित-पावन है, सतगुरू है। बाबा भी है, राजयोग भी सिखाते हैं। जो ब्रह्माण्ड का, सारे विश्व का मालिक है, वही स्वर्ग का मालिक बनायेंगे ना। शरीरधारी तो बना न सके। सिवाए बच्चों के बाप को कोई जानते नहीं। तुम कहेंगे परमात्मा हमको पढ़ाते हैं। तो कहेंगे यह तो कोई शास्त्रों में नहीं है कि निराकार परमपिता परमात्मा शरीर में आते हैं। अरे शिव जयन्ती गाई जाती है। गीत में भी कहा रूप बदलकर आओ। तो वह किस शरीर, किस रूप में आया? तुम्हारा तो यह है कर्म बन्धन का शरीर। अच्छे कर्म से अच्छा पद बुरे कर्म से बुरा पद मिलता है, इनके लिए तो ऐसा नहीं कहेंगे। मनुष्य तो पुनर्जन्म जरूर लेते हैं। बाप नहीं लेते। उसने इस शरीर में प्रवेश किया है। बताते भी हैं शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा स्थापना करते हैं। शिव तो निराकार हुआ, ब्रह्मा द्वारा कैसे करते हैं? क्या ऊपर से प्रेरणा देते हैं? पतित दुनिया में आते हैं तो किस शरीर में आवें, जो राजयोग सिखावे। तुम बच्चे जानते हो बाबा आया हुआ है, हम उनसे सुनते हैं। वह इस ब्रह्मा मुख से सुनाते हैं और सब देहधारी गुरू का नाम बतायेंगे। तुम जानते हो निराकार शिव हमारा बाबा है। पहले तो बाबा जन्म देने वाला चाहिए ना। शिवबाबा प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा एडाप्ट करते हैं। प्रजापिता को कुख से तो इतने बच्चे हो न सकें। प्रजापिता ब्रह्मा के तो अथाह बच्चे हैं। ब्राह्मण कुल बहुत बड़ा है, जो ब्राह्मण फिर देवता बनेंगे। जब देवता बनेंगे तो एडाप्शन नहीं होगी। एडाप्शन अभी है। कितने ब्राह्मण हैं। बच्चे जानते हैं हम शिवबाबा के पास आये हैं। वही नॉलेजफुल है। कहते हैं मैं तुम बच्चों को ही यह नॉलेज सुनाता हूँ। मेरा अपना शरीर तो है नहीं। शिव जयन्ती मनाते हैं परन्तु कैसे शिव बाबा आया, यह कोई नहीं जानते। कहते भी हैं शिव रात्रि। रात्रि में कृष्ण का भी जन्म दिखाते हैं। शिव जयन्ती के बाद फट से श्रीकृष्ण का जन्म होता है। शिव का जन्म तो है सगंम पर। ब्रह्मा की रात पूरी हो फिर दिन शुरू होता है। उसी संगम पर बाप आते हैं। यह है बेहद की रात्रि, वह है हद की। आधाकल्प दिन, आधाकल्प रात। भक्ति मार्ग में धक्के ही खाते रहते हैं, भगवान मिलता नहीं तो अन्धियारा ठहरा ना। बिल्कुल ही बुद्धिहीन हैं। गाते हैं परमपिता परमात्मा ऊपर है.. फिर कहते हैं तीर्थ यात्रा पर भी भगवान मिलेगा। दान-पुण्य से भी मिलेगा। कितना समय तुमने धक्के खाये हैं। अनेक मतें हैं इसलिए कहा जाता है भक्ति मार्ग है ब्रह्मा की रात। धक्के खाते-खाते दुर्गति को पाकर पाप आत्मा बन पड़ते हैं। विकार से पैदा होने वालों को ही पाप आत्मा कहा जाता है। तुम ऐसे तो नहीं कहेंगे कि श्रीकृष्ण कोई विकार से पैदा हुए। नहीं, वह तो योगबल से पैदा होते हैं। इन बातों को तुम भारतवासी गृहस्थ धर्म वाले जानते हो। सन्यासी नहीं जानते, न मानते हैं। बाप कहते हैं लाडले बच्चे सतयुग में तुम पवित्र प्रवृत्ति मार्ग में थे फिर पुनर्जन्म लेते पतित भी बनते हो। भारत पवित्र था, देवताओं का राज्य था। वहाँ शान्ति भी थी, यूँ शान्तिधाम, निर्वाणधाम है परन्तु सतयुग में भी तुमको वर्सा मिला हुआ है, इसलिए वहाँ कभी अशान्त होते नहीं। एक दो को दु:ख दे कभी अशान्त नहीं करते। कोई भी किसको दु:ख नहीं देते। यहाँ तो बच्चे भी माँ बाप को दु:ख दे अशान्त कर देते हैं। अभी तुम शान्ति के सागर से वर्सा ले रहे हो। वहाँ कोई लड़ाई झगड़ा नहीं होता है। यहाँ भी तुम्हारी वह अवस्था चाहिए। आपस में लूनपानी नहीं होना चाहिए। पहले-पहले तो यह निश्चय चाहिए– बेहद का बाप आया हुआ है, हमको दु:ख की दुनिया से ले जायेंगे घर। सतयुग में तो बाप आते नहीं। यहाँ आकर इन खिड़कियों से (नयनों से) तुमको देखते हैं। इनकी आत्मा भी देखती है, शिवबाबा भी देखते हैं। एक शरीर में दो आत्मायें कैसे हो सकती, मनुष्य नहीं मानेंगे। अरे तुम ब्राह्मण खिलाते हो, पति की अथवा बाप की आत्मा को बुलाते हो, वह आकर बोलती है। उनसे पूछते हैं तो दो आत्मायें हुई ना। बाबा कहते हैं वह आत्मायें आकर बैठती नहीं हैं। यह हो न सके। बाप को तो अपना शरीर है नहीं। वह तो आ सकता है ना। 5 हजार वर्ष पहले भी हमने ऐसे कहा था कि साधारण बूढ़े तन में भागीरथ अर्थात् भाग्यशाली रथ में आता हूँ। जरूर मनुष्य के तन में आयेगा न कि बैल पर आयेगा? सूक्ष्मवतन में शंकर के आगे बैल कहाँ से आया? अगर शंकर की अथवा शंकर पार्वती की पूजा करते हैं तो मैं साक्षात्कार करा देता हूँ। बाकी यह दिखाया है शंकर ने पार्वती को कथा सुनाई, यह है झूठ। शंकर क्यों कथा सुनायेंगे? सूक्ष्मवतन में तो दरकार ही नहीं। तुम फरिश्ते बन जायेंगे तो कथा पूरी होगी। कथा सुनाई जाती है पतित को पावन बनाने के लिए। बाबा अमरकथा सुनाते हैं अमरलोक में ले जाने, लायक बनाते हैं। अमरलोक सतयुग को कहा जाता है। यह है मृत्युलोक। आज बाबा ने पूछा शिवबाबा स्नान करते हैं? बोला, बापदादा करते हैं। हमने कहा स्नान तो दादा करते हैं ना। शिव क्यों करेगा! उनको थोड़ेही पाखाने में जाना है जो स्नान करें। शिव तो अभोक्ता है ना। यह समझ की बात है ना। वह थोड़ेही अपवित्र बनते हैं जो स्नान करेंगे। वह तो आते ही हैं पतितों को पावन बनाने। करनकरावनहार, अभोक्ता, असोचता है। अकर्ता कहना रांग हो जाता है। पतितों को पावन करते हैं ना। करनकरावनहार है। (खांसी हुई) इनकी आत्मा का यह शरीर रूपी बाजा डिफेक्टेड हो गया तो शिवबाबा क्या करेगा? तुम ऐसे नहीं कहेंगे कि शिवबाबा के बाजे में डिफेक्ट हुआ। नहीं, यह शरीर उनका नहीं, लोन लिया हुआ है। लोन ली हुई चीज टूट जाती है तो धनी की टूटेगी ना। शिवबाबा इस शरीर का धनी नहीं। धनी तो यह (ब्रह्मा) है। उसने यह किराये पर लिया है। यह भाग्यशाली रथ है। बैल एक ही है। फिर गऊ मुख भी कहते हैं। बाबा कहते हैं बरोबर कोई-कोई बच्चियां इतनी होशियार नहीं हैं। किसको उठाना है तो मैं बच्चों में जाकर उठाता हूँ। पतित दुनिया में, पतित शरीर में तो आना ही होता है। तो किसका कल्याण करने के लिए भी बच्चों में प्रवेश करता हूँ। बच्चे नहीं समझेंगे। उनसे भी वह सुनने वाले बड़े तीखे हो जाते हैं। यह बाप की मदद मिलती है। एक तो निश्चयबुद्धि हैं, दूसरा फिर दृष्टि मिलती है। बाबा कहते हैं मैं प्रवेश कर सकता हूँ, ऐसे नहीं मैं सर्वव्यापी हूँ। मुझे बहुरूपी क्यों कहते हैं? जो जिसकी पूजा करते हैं उनका साक्षात्कार कराता हूँ। साक्षात्कार में ऐसे देखते हैं कि जैसे सामने आ रहे हैं। विष्णु का साक्षात्कार होता है, विष्णु चैतन्य हो जाता है। माथे पर हाथ रखते हैं। कहते हैं मुझे चतुर्भुज का साक्षात्कार हुआ। परन्तु उनसे फायदा क्या? कुछ भी नहीं। सिर्फ दिल खुश हुई– मुझे भगवान का दीदार हुआ। भक्ति में दीदार बहुत होते हैं, परन्तु इससे सद्गति को नहीं पाते हैं। जबकि गाते हैं सद्गति दाता, पतित-पावन एक है। विष्णु नहीं हो सकता। वह बाप थोड़ेही होंगे। बाप एक है फिर उनका बच्चा भी एक है प्रजापिता ब्रह्मा। ऐसे कभी नहीं कहेंगे प्रजापिता विष्णु वा शंकर। प्रजापिता एक, फिर उनसे ब्राह्मण एडाप्शन होती है। बच्चे जानते हैं हम पहले ब्राह्मण बनते हैं फिर देवता बनते हैं। ब्राह्मणों की माला एक्यूरेट बन न सके क्योंकि अदल-बदल होती रहती है। कोई गिरते, कोई मरते रहते हैं। फिर क्या करेंगे! उनको निकाल देंगे? रूद्र माला अन्त में ही एक्यूरेट बनेंगी। यह मीठी-मीठी बातें बाप ही सुनाते हैं और कोई को पता ही नहीं है। कितने हैं जो कहते हैं हे राम जी संसार बना ही नहीं है..... अब रामचन्द्र तो यहाँ से प्रालब्ध ले जाते हैं, त्रेता में जाकर राजा बनते, उनको फिर अज्ञान कहाँ से आया? जो वशिष्ठ उनको ज्ञान दे कि संसार बना ही नहीं है। यह सृष्टि का चक्र है। सभी बातों में मूंझे हुए हैं। कोई भी नहीं जानते हैं, न समझ सकते हैं। शिवबाबा को ही गुम कर दिया है। शिव जयन्ती मनाते भी हैं, परन्तु समझते नहीं। श्रीकृष्ण ही सावंरा बनता है। बाबा आते भी तब हैं जब इनको सांवरे से गोरा बनाना है। शिव जयन्ती के बाद झट श्रीकृष्ण का जन्म होता है। शिवबाबा आकर राजयोग सिखाते हैं, किसको? ब्राह्मणों को। प्रजापिता ब्रह्मा के मुख वंशावली को। वही फिर राजा रानी बनते हैं। शिवबाबा चले जायेंगे फिर लक्ष्मी-नारायण का राज्य होगा तो बाप ने कृष्ण को ऐसा बनाया है। उन्होंने फिर बाप के बदले कृष्ण का नाम लगा दिया है। कृष्ण को द्वापर में ले गये हैं। अब शिवबाबा राजयोग सिखाते हैं। तुम जानते हो हम स्वर्ग की राजधानी स्थापना कर रहे हैं, और भी बहुत प्रिन्स प्रिन्सेज बनते हैं। संगम और सतयुग का किसको पता ही नहीं। मैं आता ही हूँ कल्प के संगम पर। उन्होंने फिर युगे-युगे कह दिया है। सो भी 4 युग होते हैं। द्वापर के बाद कलियुग होता है। फिर उस द्वापर युग में आकर क्या करेंगे? उतरती कला में सबको जाना ही है। मेरा तो पार्ट ही तब है जब चढ़ती कला होती है, इनको तो नीचे उतरना ही है। तुम बच्चों को 84 जन्म पूरे करने हैं। ऊंच ते ऊंच है ब्राह्मण वर्ण। ब्राह्मण फिर देवता, क्षत्रिय... यह वर्ण भी भारत में गाये जाते हैं। विराट रूप का चित्र बनाते हैं, उनमें ब्राह्मणों को और शिव को गुम कर दिया है। यह बातें कोई शास्त्रों में नहीं हैं। शिवबाबा आकर एडाप्ट करते हैं ब्रह्मा द्वारा। शूद्र से ब्राह्मण बनाते हैं। बाकी सूक्ष्मवतनवासी ब्रह्मा वह कैसे प्रजापिता बन सकते। पहले यह निश्चय चाहिए बरोबर वह बाप भी है, टीचर भी है, सतगुरू भी है। कहते भी हैं सद्गति दाता एक है परन्तु उनका नाम रूप देश काल नहीं जानते। अच्छा– 

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बच्चों को रूहानी बाप की नमस्ते। 
धारणा के लिए मुख्य सार:

1) शान्ति के सागर बाप से शान्ति– सुख का वर्सा ले शान्त चित रहना है। कभी किसी को दु:ख दे अशान्त नहीं करना है। लूनपानी नहीं होना है।
2) बाप समान अन्धों की लाठी बनना है। बाप की मदद लेने के लिए निश्चयबुद्धि बन सेवा करना है।

वरदान:

हर खजाने को स्व प्रति और सर्व प्रति कार्य में लगाने वाले अनुभवी मूर्त भव

समाने की शक्ति को धारण कर सर्व खजानों से सम्पन्न बन उन्हें स्व के कार्य में अथवा अन्य की सेवा के कार्य में यूज करो। खजानों को यूज करने से अनुभवी मूर्त बनते जायेंगे। सुनना, समाना और समय पर कार्य में लगाना-इसी विधि से अनुभव की अथॉरिटी बन सकते हो। जैसे सुनना अच्छा लगता है, प्वाइंट बड़ी अच्छी शक्तिशाली है, ऐसे उसे यूज करके शक्तिशाली विजयी बन जाओ तब कहेंगे अनुभवी मूर्त।

स्लोगनगुणवान उसे कहा जाता-जो ग्लानि करने वालों को भी गुण माला पहनाता चले।

10/05/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन || HINDI || (OM SHANTI)

“मीठे बच्चे - तुम सच्चे-सच्चे आशिक बन मुझ एक माशूक को याद करो तो तुम्हारी आयु बढ़ जायेगी, योग और पढ़ाई से ही तुम ऊंच पद पा सकेंगे”

प्रश्न: भारत को स्वर्ग बनाने के लिए बाप बच्चों से कौन सी मदद मांगते हैं?

उत्तरबच्चे - मुझे पवित्रता की मदद चाहिए। प्रतिज्ञा करो - हम काम विकार को लात मार पवित्र जरूर बनेंगे। सवेरे-सवेरे उठ अपने से बातें करो - मीठे बाबा हम आपकी मदद के लिए तैयार हैं। हम पवित्र बन भारत को पवित्र जरूर बनायेंगे। हम आपकी शिक्षा पर जरूर चलेंगे। कोई भी पाप का काम नहीं करेंगे। बाबा आपकी कमाल है, स्वप्न में भी नहीं था कि हम कोई विश्व का मालिक बनेंगे। आप हमें क्या से क्या बना रहे हैं।

गीत:-   तुम्हारे बुलाने को...  

ओम् शान्ति।

लाडले बच्चे यह जानते हैं, हम आत्मायें आशिक हैं उस एक माशूक बाप की। बच्चे जानते हैं आशिक और माशूक का सम्बन्ध कितना तीखा होता है। वह जिस्मानी आशिक जो होते हैं वो जिस्म पर आशिक होते हैं, विकार के लिए नहीं। बच्चे जानते हैं जब कोई की शादी होती है तो वह भल स्त्री-पुरूष कहलाते हैं परन्तु वह भी आशिक माशूक हैं एक दो को पतित बनाने वाले। पहले से ही उनको पता है, जानते हैं विकारी बनेंगे। अभी तुम बच्चे आशिक बने हो एक माशूक के, जो सभी आत्माओं का माशूक है। सभी उस एक के आशिक हैं। सब भक्त आशिक हैं भगवान के। परन्तु भक्तों को भगवान का पता नहीं है। भगवान को न जानने कारण कुछ भी शक्ति आदि उनसे पा नहीं सकते। साधू-सन्त आदि पवित्र रहते हैं तो उनको कुछ न कुछ अल्पकाल के लिए मिलता है। तुम तो याद करते हो एक माशूक को। उससे बुद्धियोग लगाया जाता है। जो बाप भी है, शिक्षक भी है, पतित-पावन सर्वशक्तिमान् है। उस बाप से तुम योग लगाकर शक्ति लेते हो। तुम्हारा ज्ञान ही अलग है, शक्ति लेते हो माया पर जीत पाने लिए। ऐसा जो विश्व का मालिक बनाने वाला माशूक है, कितना मीठा है। जिन्होंने बाप को अपना बनाया है वह जानते हैं कितना अच्छा माशूक है, जिसको आधाकल्प से सब याद करते हैं। वह जिस्मानी आशिक माशूक तो एक जन्म के होते हैं। तुमने तो आधाकल्प याद किया है। अभी तुमने बाप को जाना है तो तुमको बहुत शक्ति मिल रही है। तुम श्रीमत पर चल स्वर्ग का श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ मालिक बनते हो। आशिक बनती है आत्मा, कर्तव्य आत्मा करती है - कर्मेन्द्रियों से।

अभी तुम बच्चों को यह धुन लगी हुई है कि बाप से वर्सा लेना है। विष की लेन-देन के लिए जो हथियाला बांधते थे वह बाप ने आकर अब कैन्सिल किया है। कहते हैं इन सब बातों को छोड़ अब मेरे को याद करो। जिस्मानी आशिक को भी हर समय खाते-पीते, उठते-बैठते माशूक की याद रहती है ना। उनमें बुरी भावना नहीं होती है। विकार की बात नहीं। अभी तुम याद करते हो एक को। याद के पुरूषार्थ अनुसार तुम अपनी आयु बढ़ा सकते हो। समझो कोई ब्राह्मण कहते हैं कि तुम्हारी आयु 50 वर्ष है, बाप कहते हैं तुम अभी योगबल से अपनी आयु बढ़ा सकते हो। जितना योग में जास्ती रहेंगे उतना आयु बढ़ेगी। फिर भविष्य जन्म-जन्मान्तर बड़ी आयु वाले ही बन जायेंगे। योग नहीं तो फिर सजा खानी पड़ती है, फिर पद भी कम हो पड़ता है। भल सुखी तो सब बनेंगे परन्तु योग और पढ़ाई से। फ़र्क सारा पद का रहता है ना। जितना पुरूषार्थ उतना ऊंच पद। धन तो नम्बरवार होगा ना। एक जैसे सब धनी हो न सकें। तो बाप समझाते हैं बच्चे जितना हो सके मेरी मत पर चलो। आधाकल्प तुम आसुरी मत पर चलते हो, जिससे तुम्हारी आयु कमती होती गई है। भल कितना भी बड़ा आदमी हो। आज जन्म लिया, कल मर गया। दान-पुण्य करने से बड़े घर में जन्म मिलता है ना। अब बाप तुमको अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान दे झोली भर रहे हैं। तुम कितने साहूकार बनते हो। यह अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान कहो अथवा वर्सा कहो, बाप से मिल रहा है। तुम बाप से वर्सा लेते हो तो तुमको फिर औरों को रास्ता बताना है। भगवान के हम बच्चे हैं तो जरूर भगवान भगवती पद मिलना चाहिए। भारत में गाया जाता है गॉडेज लक्ष्मी, गॉड नारायण। नई दुनिया में गॉड गॉडेज ही राज्य करते हैं क्योंकि गॉड द्वारा पद मिला हुआ है। परन्तु बाप समझाते हैं अगर उनको गॉड गॉडेज कहेंगे तो यथा राजा रानी तथा प्रजा को भी गॉड गॉडेज कहना पड़े, इसलिए देवी-देवता कहा जाता है।

तुम जानते हो हम भारत को स्वर्ग बना रहे हैं। परमपिता परमात्मा की श्रीमत द्वारा हम राजयोग सीखते हैं। फिर राज्य भाग्य पायेंगे। परमात्मा ही स्वर्ग की स्थापना करते हैं तो जरूर नर्क में आवें तब तो नर्क को स्वर्ग बनावें। जो कल्प पहले बने होंगे वही बनेंगे। सब एकरस तो नहीं होते हैं, नम्बरवार पुरूषार्थ करते हैं। आजकल तो बच्चे हिम्मत कर पान का बीड़ा उठाते हैं - बाबा फलानी बच्ची को बहुत मार पड़ती है, हम उनको बचाने के लिए युगल बन जाते हैं। अच्छा यह तो ठीक है परन्तु फिर ज्ञान की ताकत चाहिए, धारणा चाहिए। जितना वारिस और प्रजा बनायेंगे, कांटों को फूल बनाने की सेवा करेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। कितनी मेहनत करनी पड़ती है। ऐसे बहुत विलायत में भी रहते हैं। कम्पैनियन हो रहते हैं, पवित्र रहते हैं। फिर सब मिलकियत स्त्री को दे देते वा तो चैरिटी में दे देते हैं। अभी तुम बच्चों को परमपिता परमात्मा माशूक मिला है, जो तुमको विश्व का मालिक बनाते हैं तो उनकी कितनी याद रहनी चाहिए। ऐसे बाप को तो बहुत याद करना चाहिए। तुम ही बाप को जानते हो और कोई भी साधू-सन्त आदि बाप को नहीं जानते। यहाँ बाप बच्चों के सम्मुख बैठे हैं। इस समय भल कोई पवित्र रहते हैं परन्तु उन्हें पवित्रता का बल नहीं मिल सकता। जितना तुम बच्चों को पतित-पावन बाप से मिलता है क्योंकि वह बाप को नहीं जानते। आत्मा सो परमात्मा अथवा ब्रह्म ही परमात्मा है - ऐसे कह देते हैं। अनेकानेक मत-मतान्तर हैं। यहाँ तुम सबकी एक अद्वैत मत है। मनुष्य से देवता बनने की मत मिलती है बाप द्वारा। बरोबर मनुष्य से देवता बनाने में देरी नहीं लगती है। मूत पलीती मनुष्यों को आकर पवित्र बनाते हैं। महिमा तो है ना। बाकी शास्त्र तो बहुत सुनते, पढ़ते आये हैं परन्तु उनसे कोई फल नहीं मिलता। अभी बाप आये हैं तो उनका सच्चा-सच्चा आशिक बनना चाहिए। बुद्धियोग और कहाँ भटकना नहीं चाहिए। गृहस्थ व्यवहार में भल रहो परन्तु कमल फूल समान। भक्ति मार्ग में तो कोई हनूमान को, कोई गणेश को, कोई किसको पकड़ते आये हैं। परन्तु वह कोई भगवान तो नहीं हैं। भल शिवबाबा का नाम भी याद है, परन्तु समझते नहीं हैं। परमात्मा को पत्थर ठिक्कर में डाल दिया है। सूत ही सारा मूँझा हुआ है, सिवाए बाप के कोई उनको सुलझा न सके। भगवान किसको भी मिलता नहीं। स्वयं भगवान कहते हैं जब भक्ति पूरी हो तब मैं आऊं। आधाकल्प भक्ति मार्ग चलता है, दिन और रात। शुरू में भी पहले-पहले जब प्रवेशता हुई तो दीवारों पर ऐसे-ऐसे चक्र निकालते रहते थे, जैसे छोटे बच्चे होते हैं। समझ में कुछ नहीं आता था। हम तुम सब बेबीज़ थे, फिर धीरे-धीरे बुद्धि में आता गया। अभी तुम पढ़कर होशियार हुए हो तो बिल्कुल सहज रीति समझा सकते हो। ऐसे नहीं समझना यह बहुत पुराने बच्चे हैं, इसलिए हमसे होशियार हैं। हम तो इतना पढ़ नहीं सकेंगे। बाबा कहते हैं - पिछाड़ी में आने वाले बहुत आगे जा सकते हैं। देरी से आने वाले और ही दिन-रात योग में मस्त हो लग पड़ेंगे। दिन-प्रतिदिन प्वाइंट्स बहुत अच्छी-अच्छी मिलती रहती हैं। परमपिता परमात्मा स्वर्ग का रचयिता है तो उनसे वर्सा मिलना चाहिए ना। सतयुग में था। अभी नहीं है, तब तो बाप फिर देने आये हैं। कितने उपाय किये जाते हैं कि बच्चों को कुछ समझ में आ जाए और योग में लग जाएं। कोई कहते हमको फुर्सत नहीं। इस याद से ही तुम सदैव के लिए निरोगी बनेंगे। तो उस धन्धे में लग जाना चाहिए ना। इसमें स्थूल कुछ भी करने का नहीं है। लौकिक बाप की याद रह सकती है, पारलौकिक बाप को क्यों भूल जाते हो। बाप कहते हैं तुम भारतवासियों को 5 हजार वर्ष पहले भी वर्सा दिया था ना। तुम विश्व के मालिक थे ना - क्या यह भूल गये हो? तुम सूर्यवंशी थे, फिर चन्द्रवंशी, वैश्य वंशी बनें। अब फिर ब्राह्मण वंशी बनाने आया हूँ। ब्राह्मण बनेंगे तब तो यज्ञ की सम्भाल कर सकेंगे। ब्राह्मण कभी विकारी बन नहीं सकते। अन्त तक तो पवित्र रहना ही है तब नई दुनिया के मालिक बन सकेंगे। कितनी भारी प्राप्ति है। तुम बाप को याद नहीं करते हो। बच्चा बनकर और बाप को याद न करे ऐसा तो कभी होता नहीं। बाप को भूल जायेंगे तो वर्सा कैसे मिलेगा? यह तो आमदनी है ना। साधू-सन्तों के पास तो प्राप्ति कुछ नहीं है। सिर्फ पवित्रता का बल है, ईश्वरीय बल नहीं है। ईश्वर को जानते ही नहीं तो बल मिले कैसे? बल तुमको मिला है। बाप खुद कहते हैं हम तुमको स्वर्ग का मालिक बनाने आये हैं। तुम थोड़े समय के लिए पवित्र नहीं रह सकते हो? क्रोध है सेकेण्ड नम्बर भूत। बड़े ते बड़ा भूत है काम का। सतयुग में भारत वाइसलेस था, कितना सुखी था। विशश बना है तो अब भारत का क्या हाल हो गया है! बाप फिर भारत को वाइसलेस बनाने आये हैं तो ऐसे बाप को याद करना तुम भूल जाते हो? माया फट से विकर्म करा देती है! बड़ी भारी मंजिल है। तुम ऐसे बाप की श्रीमत पर नहीं चलते हो! ऐसे बाप से प्यार नहीं है! कहते हैं भूल जाते हैं, अच्छा एक घड़ी, आधी घड़ी... कम से कम इतनी तो कोशिश करो जो अन्त में बाप ही याद रहे। यह अन्तकाल है ना। अन्तकाल जो नारायण सिमरे... मैं नारायण बनता हूँ। तुम भी बनते हो ना। बाप कहते हैं पूरे आशिक भी बनो ना। बाप तो दाता है। बाप को अपना बनायेंगे तो बाप राय अथवा मत देंगे। सौतेले को तो मत नहीं देंगे। बाप तो दाता है। तुमसे कुछ लेते हैं क्या? तुम जो कुछ भी करते हो अपने लिए। मैं तो विश्व का मालिक भी नहीं बनता हूँ। ऐसे कभी नहीं समझना है कि हम शिवबाबा को दान देते हैं। नहीं, शिवबाबा से वर्सा लेते हैं। मरने समय दान कराते हैं ना। करनीघोर को सब देते हैं। तुम्हारे पास है ही क्या? ठिक्कर ठोबर दान करते हो परमात्मा को। तुम्हारा यह सब खत्म हो जाना है। मरने से डरते तो नहीं हो ना! बाप कहते हैं इस छी-छी दुनिया से मरना अच्छा है। 5 हजार वर्ष पहले भी मच्छरों सदृश्य सबको ले गये थे। मैं तुम्हारा कालों का काल बाप भी हूँ। तुमको आधाकल्प के लिए काल के पंजे से छुड़ाता हूँ। वहाँ तो आत्मा स्वतत्र रहती है। जब शरीर पुराना हो तब छोड़कर नया ले लेती है। अभी भी समझते हैं बाबा पास जाना है तो सवेरे उठकर बाबा से बातें करो। बाबा आपकी तो कमाल है, स्वप्न में भी नहीं था कि आप आकर हमको स्वर्ग का मालिक बनायेंगे। हम तो बिल्कुल घोर अन्धियारे में थे। बाबा आपकी कमाल है। आपकी शिक्षा पर जरूर चलेंगे। कोई भी पाप का काम नहीं करेंगे। काम के भूत को पहले लात मारेंगे। पवित्रता की प्रतिज्ञा करो। बाबा, मीठे बाबा, हम आपकी मदद के लिये हाज़िर हूँ... ऐसे-ऐसे बातें करनी होती हैं। जैसे बाबा पुरूषार्थ करते हैं, बच्चों को सुनाते हैं। बाबा हम अशरीरी आये थे, अभी याद पड़ा... इस पुरानी दुनिया को भूलने का पुरूषार्थ करना है। शिवबाबा को इतने ढेर बच्चे हैं। ओना तो होगा ना! ब्रह्मा को भी ओना होगा ना! कितने ढेर बच्चे हैं, कितनी सम्भाल होती है। बच्चे बिल्कुल आराम से रहें। यहाँ तुम ईश्वरीय घर में हो ना। कोई संगदोष नहीं। बाप सम्मुख बैठा है। तुम्हीं से खाऊं, बैठूं... तुम जानते हो शिवबाबा इसमें आकर बच्चा-बच्चा कहते हैं। कहते हैं मेरे लाडले बच्चे प्रतिज्ञा करो कि विकार में कभी भी नहीं जायेंगे। पवित्रता की मुझे मदद करो तो भारत को पवित्र बनायेंगे। हिम्मते बच्चे मददे बाप... याद नहीं आता है। कल्प-कल्प हम यही धन्धा करते हैं, भारत को स्वर्ग बनाते हैं। जो मेहनत करेंगे वही स्वर्ग के मालिक बनेंगे। कांग्रेसियों ने बापू को कितनी मदद की। अब देखो राज्य मिला... परन्तु राम राज्य तो बना नहीं। दिन-प्रतिदिन और ही तमोप्रधान होते जाते हैं। बाप आकर सुखधाम का मालिक बना रहे हैं। आधाकल्प तुम सुखी रहते हो। अच्छा -

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:

1) सच्चा-सच्चा आशिक बनना है। बुद्धियोग एक माशुक से लगाना है। बुद्धि इधर-उधर न भटके इस पर अटेन्शन देना है।
2) प्राप्ति को सामने रखते हुए बाप को निरन्तर याद करना है। पवित्र जरूर बनना है। भारत को स्वर्ग बनाने का धन्धा करना है।

वरदान:

श्रेष्ठ संस्कारों के आधार पर भविष्य संसार बनाने वाले धारणा स्वरूप भव

अभी के श्रेष्ठ संस्कारों से ही भविष्य संसार बनेगा। एक राज्य, एक धर्म के संस्कार ही भविष्य संसार का फाउण्डेशन हैं। स्वराज्य का धर्म वा धारणा है - मन-वचन-कर्म, सम्बन्ध-सम्पर्क में सब प्रकार की पवित्रता। संकल्प वा स्वप्न मात्र भी अपवित्रता अर्थात् दूसरा धर्म न हो। जहाँ पवित्रता है वहाँ अपवित्रता अर्थात् व्यर्थ वा विकल्प का नामनिशान नहीं रहता, उन्हें ही धारणा स्वरूप कहा जाता है।

स्लोगनदृढ़ता की शक्ति कड़े संस्कारों को भी मोम की तरह पिघला देती है।

17-04-17 प्रात:मुरली ओम शान्ति “बापदादा” मधुबन || Hindi ||

17-04-17 प्रात:मुरली ओम शान्ति “बापदादा” मधुबन

“मीठे बच्चे - ऊंच पद पाना है तो आत्मा में ज्ञान का पेट्रोल भरते जाओ, सवेरे-सवेरे उठकर बाप को याद करो, कोई भी उल्टी चलन नहीं चलो''

प्रश्नः-बाबा हर बच्चे की जन्म-पत्री जानते हुए भी सुनाते नहीं, क्यों?

उत्तर:- क्योंकि बाबा कहते मैं हूँ शिक्षक, मेरा काम है तुम बच्चों को शिक्षा देकर सुधारना बाकी तुम्हारे अन्दर क्या है, यह मैं सुनाऊंगा नहीं। मैं आया हूँ आत्मा को इन्जेक्शन लगाने न कि शारीरिक बीमारी ठीक करने।

प्रश्नः-तुम बच्चे अभी किस बात से डरते नहीं हो, क्यों?

उत्तर:- तुम अभी इस पुराने शरीर को छोड़ने से डरते नहीं हो क्योंकि तुम्हारी बुद्धि में है - हम आत्मा अविनाशी हैं। बाकी यह पुराना शरीर भल चला जाए हमें तो वापिस घर जाना है। हम अशरीरी आत्मा हैं। बाकी इस शरीर में रहते बाप से ज्ञान अमृत पी रहे हैं इसलिए बाबा कहते बच्चे सदा जीते रहो; सर्विसएबुल बनो तो आयु बढ़ती जायेगी।

गीत:-बचपन के दिन भुला न देना......
ओम् शान्ति!

बच्चों ने गीत सुना। जिसको अब मम्मा बाबा कहते हैं उनको भुलाना नहीं है। गीत जिन्होंने बनाया है वह तो अर्थ को समझते नहीं हैं। यह निश्चय ही नहीं है कि हम उस परमपिता परमात्मा की सन्तान हैं। उस परमपिता परमात्मा को, पतितों को पावन बनाने के लिए आना पड़ता है। कितनी ऊंची सर्विस पर आते हैं। उनको कोई अभिमान नहीं है, उसको कहा जाता है निरंहकारी। उनको निश्चयबुद्धि वा देही-अभिमानी होने की बात नहीं। वह कब संशय में आते नहीं। देह-अभिमानी बनते ही नहीं। मनुष्य देह-अभिमानी बनते हैं तो फिर देही-अभिमानी बनने में कितनी मेहनत लगती है। बाबा कहते हैं अपने को आत्मा समझो। मनुष्य तो कह देते हैं अपने को परमात्मा समझो। कितना फर्क है। एक तरफ याद करते हैं पतित-पावन को, फिर कहते हैं सबमें परमात्मा है। उनको जाकर समझाना है। बाबा देखो कहाँ से आया है तुम बच्चों को सुधारने के लिए। जिनको पक्का निश्चय है वह तो कहते हैं बरोबर आप हमारे मात-पिता हो। हम आपकी श्रीमत पर चल श्रेष्ठ देवता बनने के लिए यहाँ आये हैं। परमात्मा तो सदैव पावन ही पावन है। उनको बुलाते हैं - पतित दुनिया में आओ। तो जरूर पतित शरीर में ही उसको आना पड़ेगा। पतित दुनिया में तो पावन शरीर होता ही नहीं। तो बाप देखो कितना निरहंकारी है, पतित शरीर में आना पड़ता है। हम अपने को सम्पूर्ण नहीं कहेंगे, अब बन रहे हैं।

अब बेहद का बाप कहते हैं बच्चे, श्रीमत पर चलो। बाप श्रीमत देते हैं - सवेरे उठकर याद करो तो पाप भस्म हो जायें। श्रीमत पर नहीं चलेंगे तो विकर्म विनाश नहीं होंगे। बन्दर के बन्दर ही रह जायेंगे और फिर बहुत कड़ी सज़ा खानी पड़ेगी। जानवर आदि तो सजा नहीं खाते हैं। सज़ा मनुष्य के लिए है। अगर बैल किसको मारता है, वह मर भी जाये तो क्या उनको जेल में डालेंगे! मनुष्य को तो फौरन जेल में डाल देंगे। बाप समझाते हैं इस समय मनुष्य तो उनसे भी बदतर हैं। उनको फिर मनुष्य से देवता बनना है। बाबा समझाते हैं, यह लक्ष्मी-नारायण भी गीता का ज्ञान नहीं जानते हैं। वहाँ दरकार ही नहीं क्योंकि बाप है रचयिता। वहाँ कोई त्रिकालदर्शी होते ही नहीं। अभी यह लोग त्रिकालदर्शी न होते हुए भी कह देते हैं हम भगवान हैं। तो बड़े अक्षरों में लिख दो कि गीता का भगवान परमपिता परमात्मा है न कि कृष्ण। मूल यह एकज़ भूल ही किसकी बुद्धि में नहीं बैठती है। न बच्चे किसकी बुद्धि में बिठाते हैं। भारत ही स्वर्ग था, यह भूल गये हैं। कल्प की आयु ही लाखों वर्ष कह दी है इसलिए कोई पुरानी चीज़ मिलती है तो कहते हैं यह लाखों वर्ष की है। कभी कोई-कोई कहते भी हैं - क्राइस्ट से 3 हजार वर्ष पहले भारत स्वर्ग था। तुम जानते हो हम भी देवता थे। माया ने बिल्कुल ही कौड़ी तुल्य बना दिया है। कोई भी मूल्य नहीं है। तो अब तुम बच्चों को भी घोर अन्धियारे से निकलना चाहिए। कभी कोई ऐसा कर्तव्य नहीं करना चाहिए जो तुमको भी कहना पड़े कि तुम कोई बन्दर हो। मैं कितना दूरदेश से आता हूँ, तुम्हारे मैले कपड़े धोने के लिए, तुम्हारी आत्मा बिल्कुल मैली हो गई है। अब मुझे याद करो तो तुम्हारी ज्योति जग जाये। ज्ञान का पेट्रोल भरते जाओ। तो वहाँ भी कुछ पद पाओ। वहाँ जाकर दास-दासी बनो, यह तो अच्छा नहीं है। यह है राजयोग तो पद पाना चाहिए ऊंचा। दास-दासी जाकर बनें तो भगवान से क्या वर्सा पाया, कुछ भी नहीं। बाबा से कोई पूछे तो फट से बाबा बता सकते हैं। काम करना चाहिए इशारे से। बिगर कहे जो काम करे सो देवता..। कहने से जो करे सो मनुष्य। तुमको अब श्रीमत मिलती है देवता बनने की। श्रेष्ठ बनाने वाला बाप कहते हैं कि प्रदर्शनी में बड़े-बड़े अक्षरों में ऐसा बोर्ड लगा दो तो सबकी ऑख खुले कि कृष्ण भगवान नहीं है, वह तो पुनर्जन्म में आते हैं। वह समझते हैं कृष्ण जन्म-मरण में नहीं आते हैं, वह तो हाज़िरा-हजूर है। हनूमान का पुजारी कहेगा - हनुमान हाज़िरा-हज़ूर है। यहाँ तो एक ही बाप से वर्सा लेना है। गीता का भगवान हीरे जैसा बनाते हैं। उनका नाम बदलने से भारत का यह हाल हुआ है। यह बात अजुन (अभी) इतनी जोर से समझाई नहीं है। ज्ञान का सागर तो एक ही है। वही पतित-पावन है। वो लोग फिर गंगा को पतित-पावनी कहते हैं। अब सागर से तो गंगा निकली है, तो क्यों नहीं सागर में जाकर स्नान करें। उनको समझाने के लिए बच्चों में परिस्तानी गुण चाहिए। सबको समझाना चाहिए - हम तो बाप की ही महिमा करते हैं। निराकार परमात्मा को तो सब मानते हैं। परन्तु सिर्फ सर्वव्यापी कह देते हैं। कहते भी हैं हे राम, हे परमात्मा। माला सिमरते हैं ना। ऊपर में है फूल। उसका भी अर्थ नहीं समझते। फूल और मेरू युगल दाना। माता-पिता प्रवृत्ति मार्ग है ना। रचना रचेंगे तो जरूर माता-पिता चाहिए। तो इन द्वारा बैठ लायक बनाते हैं, जो फिर माला सिमरी जाती है। परमात्मा का, आत्मा का रूप क्या है। वह भी नहीं जानते हैं। तुमने नई बात सुनी है। परमात्मा एक छोटी बिन्दी है। वन्डर है ना - इतनी छोटी बिन्दी को कोई ज्ञान सागर मानेंगे? मनुष्य को मानते हैं। परन्तु वह तो मनुष्यों को मनुष्य द्वारा ही ज्ञान मिलता है - जिससे दुर्गति ही हो गई है। यहाँ तो भगवान खुद आकर ज्ञान दे सद्गति करते हैं अर्थात् राजाओं का राजा बनाते हैं। तुम वन्डर खाते हो। आत्मा छोटी सी बिन्दी है, अति सूक्ष्म है। तो बाप भी ऐसा ही होगा ना। और है कितनी बड़ी अथॉरिटी। कैसे पतित दुनिया और पतित शरीर में आकर पढ़ाते हैं। लोग क्या जानें इन बातों को। वह तो उल्टे लटके हुए हैं। अब बाप फरमान करते हैं जो मेरी मत पर चलेंगे वही स्वर्ग का मालिक बनेंगे, इसमें डरने की बात ही नहीं। हम आत्मा अशरीरी हैं। अब वापिस जाना है। मैं तो अविनाशी आत्मा हूँ। बाकी यह पुराना शरीर भल चला जाये। हाँ बाबा ज्ञान अमृत पिलाते हैं इसलिए भल जीते रहें। वह भी जो सर्विसएबुल होंगे उनकी आयु बढ़ेगी। प्रदर्शनी में बहुत सर्विस होनी है, बहुत इप्रूवमेन्ट होगी। कृष्ण की महिमा और परमात्मा की महिमा में बहुत फ़र्क है। बाप कहते हैं तुम स्वर्ग में पावन थे। अब पतित कैसे बने हो, जानना चाहिए ना। बाप आकर पत्थर बुद्धि को पारस बनाते हैं।

ईश्वरीय सन्तान को कभी भी किसको मन्सा-वाचा-कर्मणा दु:ख नहीं देना चाहिए। बाप कहते हैं दु:ख देंगे तो महान दु:खी होकर मरेंगे। हमेशा सबको सुख देना चाहिए। घर में मेहमानों की बहुत अच्छी सेवा की जाती है। यह पुराना शरीर है, भोगना भोग, हिसाब-किताब चुक्तू करना है, इसमें डरना नहीं है। नहीं तो फिर सजा खानी पड़ेगी। बहुत मीठा बनना है। बाप कितना प्यार से समझाते हैं। कमाई में कभी उबासी वा झुटका नहीं आना चाहिए। बाप कहते हैं मुझे याद करने से तुम सदा निरोगी बन जायेंगे। तुमको स्वर्ग में ले चलने आया हूँ, तो कोई भी कुकर्म मत करो। संकल्प तो बहुत आयेंगे - फलानी चीज़ उठाकर खा लें। इनको भाकी पहन लेवें। अरे बाप तो बच्चों की जन्म-पत्री जानते हैं, इसलिए मैनर्स अच्छे धारण करने हैं। बाप कहते हैं मैं सभी की जन्म-पत्री जानता हूँ। परन्तु एक-एक को बैठ सुनाऊंगा क्या कि तुम्हारे अन्दर क्या है। मेरा काम है शिक्षा देना। मैं तो टीचर हूँ। ऐसे नहीं बाबा तो जानते हैं - हमारी दवाई आपेही भेज देंगे। बाबा कहेंगे बीमारी है तो डाक्टर के पास जाओ। हाँ सबसे अच्छी दवाई है योग। बाकी मैं कोई डाक्टर थोड़ेही हूँ जो बैठ दवाई दूँगा। हाँ कभी दे भी देता हूँ, ड्रामा में कुछ नूँध है तो। बाकी मैं तुम्हारी आत्मा को इन्जेक्शन लगाने आया हूँ। ड्रामा में है तो कभी दवा भी देते हैं। बाकी ऐसे नहीं बाबा समर्थ है, हमारी बीमारी को क्यों नहीं छुड़ा सकते हैं। भगवान तो जो चाहे सो कर सकता है। नहीं, बाप तो आये ही हैं पतितों को पावन बनाने। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) मन्सा-वाचा-कर्मणा किसी को कभी दु:ख नहीं देना है। कर्म-भोग से डरना नहीं है। खुशी-खुशी से पुराना हिसाब-किताब चुक्तू करना है।

2-) संकल्पों के वश हो कोई भी कुकर्म नहीं करना है। अच्छे मैनर्स धारण करने हैं। देवता बनने के लिए हर बात इशारे से समझ करनी है। कहलवाना नहीं है।

वरदान:- योग के प्रयोग द्वारा हर खजाने को बढ़ाने वाले सफल तपस्वी भव

बाप द्वारा प्राप्त हुए सभी खजानों पर योग का प्रयोग करो। खजानों का खर्च कम हो और प्राप्ति अधिक हो-यही है प्रयोग। जैसे समय और संकल्प श्रेष्ठ खजाने हैं। तो संकल्प का खर्च कम हो लेकिन प्राप्ति ज्यादा हो। जो साधारण व्यक्ति दो चार मिनट सोचने के बाद सफलता प्राप्त करते हैं वह आप एक दो सेकण्ड में कर लो। कम समय, कम संकल्प में रिजल्ट ज्यादा हो तब कहेंगे - योग का प्रयोग करने वाले सफल तपस्वी।

स्लोगन:-अपने आदि अनादि संस्कार-स्वभाव को स्मृति में रख सदा अचल रहो।